
I am a writer who speaks boldly, writes fiercely, and lives unapologetically. I’m not here to fit into anyone’s idea of “proper” or “palatable.” I’m here to express myself. To confront. To create.
मेरी गुमनामी मेरी पहचान बन गयी है
वो कैसे?
इस दुनिया में अनगिनत लोग रहते हैं
हम सबको न तो जानते हैं ना पहचानते हैं
जब अँधेरा होता है
हम अनगिनत गुमनाम लोग
अपने घरों की बत्तियां जलाते हैं
जिस से आस पास रोशिनी हो जाती है
ऐसे ही अगर हर गुमनाम व्यक्ति
दुसरे गुमनाम व्युक्ति केलिए कुछ भला कर दे,
अपनी गुमनामी में ,
तो उस से अनगिनत गुमनाम लोगों का भला हो सकता है
फिर हम सब अनगिनत गुमनाम लोग
अपनी गुमनामी में खुश रह सकते हैं
ख़्याल आसान सा है पर करने वाले बहुत कम
नाम और शोहरत थोड़े समय के साथी हैं,
आज हैं तो कल नहीं
आज हम नामी हैं, तो कल कोई भी नहीं
फिर क्यों न हम गुमनामी में खुश रहना सीख लें ?
गुमनाम रह कर खुश रहना,
एक महाशक्ति है…
मेरी गुमनामी ही मेरी पहचान है
मेहफ़ूज़ हूँ , आभारी हूँ |