
I am a writer who speaks boldly, writes fiercely, and lives unapologetically. I’m not here to fit into anyone’s idea of “proper” or “palatable.” I’m here to express myself. To confront. To create.
एक इंसान ने एक चिड़िया को पिंजरे में रखा
रोज़ खुशी खुशी उसे खाना और पानी देता
उसे निहारता, पुचकारता, उस से बातें भी करता
बोलता, हँसता
कहता, “देखो, कितनी खुश है मेरी चिड़िया,
कितनी देखभाल करता हूँ मैं उसकी
सब कुछ तो है उसके पास, क्या कमी है?”
चिड़िया चुप रहती,
खाती, पीती पर कभी नहीं गाती
हमेशा अपनी नज़र ऊपर रखती और एक टक तकती रहती
एक दिन इंसान ने सोचा
“ये चिड़िया क्या देखती रहती है? मैं भी तो देखूं“
उसकी नज़र के पथ पर चल पड़ा, नज़र ऊपर उठी
और उसने देखा खुला आसमान
ये देखते ही वो फूट–फूट कर रो पड़ा और बोला
“मैंने एक चिड़िया को पिंजरे में रखा
फिर उस पिंजरे को खुले आसमान के नीचे रख दिया ये सोच कर की वो खुश होगी
हाय ये मैंने क्या कर दिया !”
ज़ोर–ज़ोर से, बिलख–बिलख के रोने लगा
हाय–तोबा मचाने लगा
अपने दुःख पर रोता रहा
चिड़िया चुप रही
और धीरे धीरे उसने अपना दम तोड़ दिया
वहीं, उस पिंजरे में , खुले आसमान के नीचे
जैसे ही दम निकला, उसकी रूह उस पिंजरे से फट से निकल गयी
और फुर र र र र
उड़ चली !!
इस तरह, चिड़िया उड़ गयी
और इंसान कई दिनों तक अपने दुःख का मातम मनाता रहा
फिर एक दिन, उस से अपना दुःख सहा न गया
उस शाम, बाज़ार गया और एक और चिड़िया ले आया
चिड़िया को पिंजरे में रखा
रोज़ खुशी–खुशी उसे खाना और पानी देता
उसे निहारता, पुचकारता, उस से बातें भी करता
बोलता, हँसता
कहता, “देखो, कितनी खुश है मेरी चिड़िया,
कितनी देखभाल करता हूँ मैं उसकी
सब कुछ तो है उसके पास, क्या कमी है?
मेरी प्यारी चिड़िया “